छत्तीसगढ़ में प्रथम चरण के चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। पहले चरण में 20 सीटों पर 7 नवम्बर को चुनाव होने हैं। इसमें आदिवासी बाहुल्य बस्तर क्षेत्र की 12 और राजनांदगांव क्षेत्र की 8 संवेदनशील सीटें हैं। इस चरण में प्रदेश के दिग्गज नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व मंत्री मोहन मरकाम, विधान सभा उपाध्यक्ष संत राम नेताम, मंत्री मो. अकबर, कवासी लखमा, पूर्व मंत्री व सांसद विक्रम उसेंडी, पूर्व मंत्री लता उसेंडी, केदार कश्यप, महेश गागड़ा, आदिवासी विकास परिषद बस्तर क्षेत्र के अध्यक्ष लखेश्वर बघेल के भाग्य ईवीएम में कैद हो जाएंगे।
भाजपा ने राजनांदगांव में एक बड़ी रैली से प्रचार की शुरुआत की। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिरनपुर में आपसी रंजिशवश हुई एक युवक भुवनेश्वर साहू की हत्या को साम्प्रदायिक रंग देते हुए बयान दे दिया और कहा कि भुवनेश्वर की शहादत बेकार नहीं जाएगी। रंजिश के चलते हुई हत्या को ‘शहादत’ बताया गया।
माना गया कि यह उनकी हिन्दू वोटों को एकजुट करने की कोशिश है। पिछले दिनों कवर्धा में भी आपसी झगड़े की एक घटना को साम्प्रदायिक रंग दिया गया था। अब उस सीट पर उन्होंने मो. अकबर के सामने अपना हिन्दू चेहरा विजय शर्मा उतारा है। बिरनपुर कांग्रेस के दिग्गज नेता रवीन्द्र चौबे साजा विधानसभा (जिला बेमेतरा) से चुनावी मैदान में हैं।
बीजेपी ने भुवनेश्वर साहू के पिता ईश्वर साहू को साजा से प्रत्याशी बनाया है। राजनैतिक रणनीतिक हमला सिर्फ साजा पर केंद्रित है। राजनांदगांव में दिए अमित शाह के इस भाषण का असर क्या पूरे प्रदेश में होगा? क्या प्रथम चरण के बस्तर क्षेत्र की 12 सीटों पर भी इसका असर होगा? क्या प्रदेश में असर देखा जाएगा? ये कुछ प्रश्न हैं।
बस्तर क्षेत्र की कुल आबादी में 70% जनजाति समुदाय है। यहां गोंड, मारिया, मुरिया, भतरा, हल्बा और धुरवा समुदाय के आदिवासी रहते हैं। बस्तर को सात विकासखंड जगदलपुर, बस्तर, बकावंड, लोहंडीगुडा, तोकापाल, दरभा व बास्तानार में विभाजित किया गया है।
यह क्षेत्र पुरातनकाल से अपनी सामाजिक परंपराओं व अपने रीति-नीति पर जीवन चलाता आया है। यहां की अनेक परम्पराएं शहरी समाज में नहीं हैं, जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया से लोग आते हैं। यहां की शादियों की विविधता, नीति-नियम अलग ही स्वरूप में मौजूद हैं।
ये आदिवासी मानसिक रूप से अपने आपको हिंदू नहीं मानते। इन पर संविधान में उल्लेखित विवाह अधिनियम व उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं होते। संविधान में इसका स्पष्ट उल्लेख भी है। इस स्थिति में बस्तर, सरगुजा व आदिवासी बाहुल्यता वाले क्षेत्र में हिन्दू कार्ड चलने में शंका रहेगी।
अमित शाह का बयान हिन्दू वोटों को जगाने के लिए था। स्थिति कहती है कि इसका असर पहले चरण के मतदान में सिर्फ ोकवर्धा व बेमेतरा जिले पर ही पड़ेगा। छत्तीसगढ़ हमेशा से शांतिप्रिय क्षेत्र रहा है। ऐसे में पूरे प्रदेश में असर पड़ेगा या नहीं यह समझना शेष है।
इधर कांग्रेस अपनी ग्रामीण योजनाओं के दम पर चुनाव को साधने का प्रयास कर रही है। धान खरीदी, गोबर गौठान, बिजली हाफ, कर्ज माफी की सफलता के बाद फिर से कर्ज माफ कांग्रेस के ब्रह्मास्त्र हैं। भाजपा ने 20 सीटों में 13 नए चेहरों को, 6 पूर्व विधायकों को और एक विधायक को पहले चरण में मैदान में उतारा है।
कांग्रेस ने 7 नए चेहरों, 11 विधायकों व 2 पूर्व विधायकों को टिकट दी। 2018 के चुनाव में 20 में 17 सीट कांग्रेस ने और दो सीट (राजनांदगांव व दंतेवाड़ा) भाजपा ने जाती। खैरागढ़ की एक सीट जनता कांग्रेस (जोगी) ने जीती थी। अंतराल में दंतेवाड़ा में भीमा मंडावी व खैरागढ़ में देवव्रत सिंह के निधन से रिक्त हुई सीट पर हुए उपचुनाव में ये दोनों सीटें कांग्रेस के खाते में चली गईं।
एकमात्र राजनांदगांव की ही सीट भाजपा के खाते में शेष बची थी। इस बार अपने 13 नए और 7 पुराने चेहरों के भरोसे भाजपा को प्रथम चरण से भारी उम्मीदें हैं। उधर कांग्रेस अपने 13 पुराने व 7 नए चेहरों से उत्साहित है। सरकार बनाने के लिए दोनों ही दलों ने पूरी ताकत बस्तर में झोंक दी है। बस्तर को सरकार बनाने का द्वार कहा जाता है।
पहले चरण में कोई भी दल कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहता। केंद्र के बड़े-बड़े नेताओं का बस्तर क्षेत्र में जमावड़ा यही दर्शा रहा है। बहरहाल, एक चिंता नोटा भी है। 2018 के चुनाव में बस्तर क्षेत्र में मतदाताओं ने ‘नोटा’ का भरपूर उपयोग किया। क्या यह खेल बिगाड़ेगा?
2018 विधानसभा चुनावों में बस्तर क्षेत्र में मतदाताओं ने ‘नोटा’ का भरपूर प्रयोग किया। 12 में से 6 सीटों पर ‘नोटा’ को तीसरे सबसे ज्यादा वोट मिले। आदिवासी क्षेत्र में ‘नोटा’ को लेकर यह रुझान किसी लहर या सुगबुगाहट का इशारा तो नहीं!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)