मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है पर्यावरण सुधार, वनों की सुरक्षा और विकास में संतुलन जरूरी है। मध्यप्रदेश में आज भी 30 प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं। वन बचाने वाले राज्यों को पुरस्कृत और प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
मध्यप्रदेश में वनांचल निवासियों को वनों के लाभ से जोड़ने के सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। श्री चौहान आज यहाँ केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के दो दिवसीय चिंतन शिविर को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत की सोच एकात्मवादी है। हमारा दर्शन पशु, पक्षी, कीट पतंग सहित सभी जड़-चेतन में वही चेतना मानता है, जो मानव में है। विश्व में आज ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण सुधार आदि पर चर्चाएँ हो रही हैं जबकि हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पहले जल, वायु, चन्द्र, सूर्य, नदी, पर्वत, वनस्पति, पशु पर ध्यान दिया, उनकी पूजा की। इसका सार था कि यदि यह नहीं बचे तो मानव भी नहीं बचेगा। वर्तमान में प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से भू-जल नीचे जा रहा है, नदियाँ सूख रही हैं। विकास के नाम पर खिलवाड़ किया गया। वन्य-प्राणियों के लिये भी जगह नहीं छोड़ी। वनों की बेतहाशा कटाई हुई। दुष्परिणाम यह कि प्रकृति अपना चक्र बदल रही है। असमय वर्षा, ठंड, गर्मी हो रही है। प्राकृतिक आपदाएँ आ रही हैं। श्री चौहान ने कहा कि पिछले वर्ष प्राकृतिक आपदा से पीड़ित मध्यप्रदेश के किसानों को 3200 करोड़ रूपये बाँटे गये।
मुख्यमंत्री ने कहा प्रकृति का संतुलित दोहन किया जाये, शोषण नहीं। इसके लिये दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। लकीर के फकीर की तरह काम की बजाय ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाये जिससे न पर्यावरण बिगड़े और वनांचल के निवासियों को भी कष्ट नहीं पहुँचे। विकास भी प्रभावित नहीं हो।