उच्चतम न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक फैसले में आई टी कानून की धारा-66 ए रद्द कर दी है। न्यायालय ने इसे असंवैधानिक और अतार्किक बताया है।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इससे संविधान प्रदत्त बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता है।
न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर और आर एफ नरिमन की पीठ ने विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल अधिकार बताते हुए कहा कि धारा-66 ए से लोगों के जानने का अधिकार सीधे तौर पर प्रभावित होता है। धारा-66 ए के तहत ऑनलाइन आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने और तीन साल की सजा देने का प्रावधान था।
प्रावधान को असंवैधानिक बताने के कारणों को स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा कि इसमें प्रयुक्त असुविधाजनक और आपत्तिजनक जैसे शब्द अस्पष्ट हैं क्योंकि इससे कानून लागू करने वाली एजेंसी के लिए अपराध के मूल तत्वों को जानना मुश्किल है। पीठ ने कहा कि जो टिप्पणी किसी एक व्यक्ति के लिए आपत्तिजनक है जरूरी नहीं कि वह दूसरों के लिए भी आपत्तिजनक हो।
शीष अदालत ने आई टी कानून की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर यह फैसला दिया।
कानून की एक विद्यार्थी श्रेया सिंघल ने, 2012 में टिप्पणियां पोस्ट करने के लिए दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद इस धारा को चुनौती देते हुए पहली जनहित याचिका दायर की थी। यह टिप्पणियां शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के देहान्त के बाद मुम्बई बंद को लेकर की गई थीं। केन्द्र की दलील थी कि दुरूपयोग की आशंका के आधार पर धारा 66-ए को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।