एक परिवार के रूप में दिख रही दुनिया

बहुत पहले मैंने श्री बाशम की पुस्तक ‘ द वण्डर दैट वाज इण्डिया’ पढ़ी थी। पुस्तक भारत की अदभुत विशेषताओं पर प्रकाश डालती है। डॉ. ईश्वरी प्रसाद भी अनेकता में एकता की भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठापित करते हैं। आशय यह कि हमारे देश में ऐसी कई चीजें हैं जो दुनिया में कहीं नहीं है। भारतीय संस्कृति का यही विराट स्वरूप इन दिनों महाकाल की नगरी उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ में देखने को मिल रहा है। यहाँ सारी दुनिया एक परिवार के रूप में दिखाई दे रही है।

अपना देश और इसकी संस्कृति ऐसी है जो सब विचारों का आदर करती है। कोई कहता है मैं साकार को मानता हूँ, मूर्ति पूजा करता हूँ। दूसरों ने तर्क दिया कि भगवान मूर्ति में कैसे आ सकते हैं, वो तो सृष्टि के कण-कण में विराजमान हैं। एक विचार कहता है कि साकार को नहीं मानते तो निराकार को मानो, इसमें भी कोई आपत्ति नहीं है। यह भारत की ही धरती है, जिसमें सभी विचारों का आदर है।

यह सब चीजें मैं उज्जैन की पावन धरती पर देखकर आया हूँ। सिंहस्थ में एक से एक संत विराजमान हैं। वहाँ का दृश्य देखकर मैं अभिभूत हो गया। एक बात मैं आप सभी को बताना चाहता हूँ कि वहाँ द्वैतवादी हैं, अद्वैतवादी हैं और विशिष्टाद्वैतवादी भी हैं। इतने अलग-अलग तरह के संत हैं। मुझे लगा कि भारत में असमानता की बात कहीं नहीं है। सब साथ चल रहे-सब साथ रह रहे हैं। अलग-अलग धाराएँ सब आकर उज्जैन में इकट्ठी हो गयी हैं। वहाँ सदभाव और समरसता साक्षात है। एक वातावरण उपस्थित है, जिसमें कोई छोटा-बड़ा नहीं है। श्रेष्ठता और अहमन्यता का भाव देखे नहीं मिल रहा है। सब भूतभावन भगवान श्री महाकाल की शरण में हैं। सबके मन में एक ही विचार है कि मेरा नहीं, सबका कल्याण हो।

यहाँ जब मैं भण्डारों में गया तो सब, अन्न क्षेत्रों में बराबरी से प्रसादी पा रहे हैं। जात-पाँत बेमानी हो गई है, श्रद्धा और सेवा सर्वोपरि। अदभुत दृश्य है। कोई नहीं पूछता भोजन बनाने वाले कौन हैं, जो परोसने वाले हैं वो कौन हैं, लाइन लगी है, लोग बैठ रहे हैं। काहे की असमानता। यही असली हिन्दुस्तान की धरती है। यहाँ केवल देशी भक्त ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में विदेशी भक्त भी आये हैं। उन्हें देशी परिधान में सज-धज कर, तिलक लगाकर, हरे-रामा, हरे-कृष्णा का भजन कर आनंदित होते देख मुझे लगा कि यही है वसुधैव कुटुम्बकम्।

अयं निजो परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

यह मेरा है, यह तेरा है, यह सोच छोटे दिल वालों की होती है, जो विशाल हृदय वाले होते हैं वो कहते हैं सारी दुनिया ही एक परिवार है। एक चेतना सब में निवास करती है जिसका जीवंत दृश्य आस्था और विश्वास के समागम सिंहस्थ में पूरी तरह साकार हो रहा है।

यह सिंहस्थ बिरला है। अमृत की अवधारणा मेरे विचार में मानवता के कल्याण की दिशा में एकमत से आगे बढ़ना है। हम यही कोशिश वैचारिक अनुष्ठानों के माध्यम से कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि आज की समस्याओं के निदान का अमृत विचार इस मंथन से हम हासिल कर पायेंगे।

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