सिंहस्थ महाकुंभ में साधु-संतों की जीवन-शैली श्रद्धालुओं को अचंभित कर देती है। मोक्षदायिनी क्षिप्रा में स्नान और बाबा महाकाल सहित अन्य देवी-देवताओं को मत्था टेकने के बाद श्रद्धालु विभिन्न पंडालों में पहुँचकर साधु-संतों की अद्भुत और अलौकिक दुनिया भी देख रहे हैं।
बड़ी-बड़ी जटाएँ और धूनी रमाए नागा साधुओं को देखकर श्रद्धालु सुखद आश्चर्य से भर जाते हैं। देशी ही नहीं विदेशी श्रद्धालु भी इन साधुओं की अलौकिक दुनिया को देखने खिंचे चले आ रहे हैं।
महापर्व सिंहस्थ में अक्षय तृतीया को हुए द्वितीय शाही स्नान के समय पैदा हुए आनंद, उल्लास और अद्भुत दृश्य देखकर गए श्रद्धालु घर पहुँचकर उसका आँखों-देखा हाल अपने परिजनों और मित्रों को सुना रहे हैं। सिंहस्थ स्नान करके गए ग्वालियर निवासी महेन्द्र सिंह ने जब यहाँ के असीम आनंद का वर्णन अपने मित्र राजेश बबेले से किया तो वे अपनी पत्नी सहित पवित्र नगरी उज्जैयिनी आ गए। अमृतमयी क्षिप्रा में डुबकी लगाने के बाद वे सपरिवार विभिन्न अखाड़ों के पंडालों में साधु-संतों की अलौकिक दुनिया को देखने पहुँचे।
सिंहस्थ मेले में शैव मतावलंबी दशनामी नागा साधु और वैष्णव अखाड़ों के कई साधु तपती दोपहरी में खुले आसमान के नीचे साधना करते हुए देखे जा सकते हैं। सुबह से लेकर शाम तक तपस्या के दौरान बहुत से साधु अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते। साधु-संतों की पूजा विधि भी आश्चर्य पैदा करती है। षटकोणनुमा पंडाल में कई साधु भरी दोपहरी में अग्नि प्रज्ज्वलित कर साधना में तल्लीन हैं, तो कोई झूले पर बैठकर हरि नाम का सुमिरन कर रहा है। खड़े-खड़े साधना करते हुए रात व्यतीत करना भी बहुत से साधुओं की रोज की दिनचर्या में शामिल है।
कुछ पंडालों में एक पैर पर खड़े होकर भगवत भजन करते हुए साधु देखे जा सकते हैं। कुछ साधु मचान पर बैठकर भी तपस्या कर रहे हैं। हठयोगी साधु तरह-तरह से अपने शरीर को कष्ट देकर तपस्या करते हैं। श्रद्धालु इन साधुओं से आशीर्वाद ले रहे हैं।
नागा साधुओं की दीक्षा प्रणाली भी सिंहस्थ मेले का प्रमुख आकर्षण बनी हुई है। पवित्र क्षिप्रा में पिंडदान करने के बाद जब नव सन्यासी अपने अखाड़े की छावनी की ओर प्रस्थान करते हैं तो यह दृश्य देखते ही बनता है। दीक्षा की प्रक्रिया में तीन दिन तक उपवास, मुंडन संस्कार और पिंडदान कराया जाता है। गुरू द्वारा मंत्रोच्चार के बीच दीक्षा देकर रूद्राक्ष की माला, जनेऊ, लंगोटी और भस्मी आदि दी जाती है। इस प्रकार सन्यास जीवन में प्रवेश करने जा रहा व्यक्ति अवधूत बन जाता है। प्रणाम करने की प्रणाली भी विभिन्न मतावलम्बी साधुओं की अलग-अलग है। दशनामी नागा सन्यासी नमो:नारायण, नाथपंथी नम:शिवाय: और वैष्णव सन्यासी जय सियाराम का उच्चारण कर एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं।