अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ के पहले दिन समानांतर सत्र के दौरान कालिदास सभागृह में कृषि कुंभ में देशी-विदेशी कृषि विद्वानों द्वारा जैविक खेती पर विशेष बल दिया गया। उन्होंने कहा कि जैविक खेती में किसानों की कृषि संबंधी समस्याओं का हल निहित है।
विद्वानों ने मल्टीनेशनल कंपनियों के बीजों पर पेटेन्ट अधिकार न देने तथा कृषि में जैव विविधता को बचाने के लिए देशी किस्मों को संरक्षण और प्रोत्साहन दिये जाने को कहा। जैविक खेती एवं उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी प्रदान करने का भी सुझाव दिया गया। 
सत्र की अध्यक्षता करते हुए सीईसी हैदराबाद के वैज्ञानिक श्री के.एस. गोपाल ने कृषि में पानी की कमी, मिट्टी की उर्वरता में आयी गिरावट तथा किसानों के कौशल विकास में कमी संबंधी मुख्य समस्याएँ बताई। उनके अनुसार इनसे कृषि उत्पादकता पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि आज भी कृषि में सतही सिंचाई जल पद्धति उपयोग की जाती है, जबकि पानी की कमी को देखते हुए सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियाँ अपनाने की जरूरत है। इन पद्धतियों से पानी सीधे पौधों की जड़ों में पहुँचता है। रासायनिक खादों एवं दवाइयों के कारण मिट्टी का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। वहीं कौशल विकास के अभाव में बड़ी संख्या में किसान आज भी आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नहीं कर रहे हैं।
फोकस ऑन दी ग्लोबल साउथ के श्री अफसर जाफरी ने बीटी कॉटन और जीएम मॉडिफाइड किस्मों के बीजों का उपयोग न करने की सलाह दी । उन्होंने कहा कि मल्टीनेशनल कंपनियों द्वारा इन बीजों पर पेटेंट एकाधिकार के प्रयास किये जा रहे हैं। इनकी खेती पर बहुत अधिक व्यय आने के कारण ही नुकसान होता किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बीजों के उपयोग से देशी किस्में खत्म होती जा रही हैं वहीं हमारी जैव विविधता भी समाप्त हो रही है।
स्विट्जरलेंड के श्री क्रिस्टीयन एद्रेस ने पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन से जैविक खेती पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जैविक खेती के संबंध में उन्होंने भारतीय कृषकों से बहुत कुछ सीखा और उसे आगे बढ़ाया है। उन्होंने मृदा और फसल विज्ञान के क्षेत्र में रिसर्च टेक्नोलॉजी एवं जीन इनोवेशन के क्षेत्र में संस्था द्वारा किये गये प्रयासों की जानकारी दी।
फिलीपीन के एशिया पेसेफिक रिसर्च नेटवर्क से श्री मर्जूरी पेमेन्टूयन ने उनके देश और पूरे विश्व में सूखा के कारण उत्पन्न खाद्य समस्या पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से खेती पर विपरीत प्रभाव देखा जा रहा है।
साँची बौद्ध और भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार श्री राजेश गुप्ता ने कहा कि जैविक खेती से न केवल अधिक उत्पादन बल्कि गुणवत्तापूर्ण उपज मिलती है। उन्होंने कहा कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जन-आंदोलन की आवश्यकता है।
विशेषज्ञीय उदबोधनों के बाद प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें जैविक खेती पर सार्थक चर्चा हुई। विद्वानों द्वारा जैविक खेती के लिए पशुपालन और डेयरी को बढ़ावा देने, देशी बीज और खाद के उपयोग पर बल दिया गया। विदेशी किसानों ने भी ऑर्गेनिक फॉर्मिंग तथा आर्गेनिक प्रॉडक्ट को बढ़ावा देने पर जोर दिया। नरवाई जलाने पर रोक के लिए कानून बनाने का सुझाव भी दिया गया। जलवायु परिवर्तन के संबंध में किसानों को बड़े स्तर पर जागरूक करने के लिए भी सुझाव दिए गए।