शराब बेचने के फैसले से सरकार पर दबाव बनाने का फैसला

भाजपा सरकार के शराब बेचने के फैसले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) नाराज है। संघ पदाधिकारी तो पहले से सरकार पर शराबबंदी के लिए दबाव बना रहे थे। फिर भी इसे दरकिनार कर हाइवे की दुकानें शहर में लाने, निकायों को इनके लिए जगह देने और शराब बेचने अलग से कॉर्पोरेशन भी बना डाला। नतीजतन, अब संघ सरकार के फैसले के खिलाफ और प्रदेश की जनता के साथ है। पदाधिकारी कह रहे हैं कि जहां-जहां भी विरोध-प्रदर्शन होगा, संघ साथ खड़ा रहेगा।
विपक्ष के साथ जनता भी सड़क पर उतर गई है। इस पर छत्तीसगढ़ प्रांत सरसंघ चालक बिसराराम यादव का जो जवाब आया, उससे साफ है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा के भविष्य को लेकर वे चिंतित हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में शराब के कारण जो भयावह हालात हैं, उसे लेकर संघ गंभीर है। शराबबंदी एक साथ न हो लेकिन धीरे-धीरे तो हो। सरकार ने खुद जो तय किया, वही करती जा रही है।
अब हमने भी नाराज जनता के पक्ष में रहकर, सरकार पर और दबाव बनाने का फैसला लिया है। उधर संघ की नाराजगी पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष धरमलाल कौशिक न कोई टिप्पणी करना चाह रहे हैं, न ही आबकारी मंत्री अमर अग्रवाल। कौशिक ने ‘नईदुनिया’ से पहले कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन होना चाहिए। इस मामले पर सरकार ने अब तक संगठन से कोई सुझाव नहीं लिया है।
यह सरासर गलत है। हम लंबे समय से सरकार को समझा रहे हैं कि गरीबी, अस्वस्थता और दुर्व्यवहार का कारण शराब ही है। लेकिन, दुकान चलाने के पीछे सरकार का मत राजस्व बढ़ाना है, जबकि संघ का मत है शराब बंद हो।
हम लोग तो कहते रहते हैं। बैठकें हुईं, उनमें कहा कि शराब प्रदेशहित में नहीं है। फिर, दबावपूर्वक भी मैंने शराबबंदी के लिए कहा है। अभी जो फैसला हुआ है, वह गलत है। जब भी मौका मिलेगा, तब सरकार से व्यक्तिगत तौर पर बोलूंगा।
एक साथ शराबबंदी नहीं हो सकती। धीरे-धीरे करें। सरकार ने दो हजार शराब दुकानों को कम करके 700 के लगभग किया है। अभी हाइवे की दुकानों को शिफ्ट करने के बजाए, बंद कर देना था।
आय के दूसरे रास्ते भी हैं। सरकार की तरफ से अनावश्यक खर्च होता है, उसका क्या…? सरकार ये भी सोचे कि शराब पीने से ही ज्यादातर लोगों का स्वास्थ्य खराब होता है। स्मार्ट कार्ड से उनके लिए राशि उपलबध कराती है। शराबबंदी से यह खर्च कम हो जाएगा।
बिहार के सीएम नितिश कुमार की तरह यहां दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं है। सरकार हिम्मत ही नहीं कर पा रही। दूसरा, पार्टी के विधायक सरकार के फैसले से असंतुष्ट तो हैं, लेकिन उन्हें अपनी जनता से ज्यादा पॉलीटिकल कैरियर की चिंता है। इस कारण खुलकर बोलना छोड़ दिया है।

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