१८ साल बाद याद आई छात्रावास में होने वाली धांधली पर करवाई के आश्वासन की

श्योपुर के पूर्व विधायक बृजराज सिंह चौहान ने 18 साल पहले छात्रावासों में नियुक्ति में धांधली का मामला विधानसभा में उठाया था। तब सरकार ने तत्काल कार्रवाई का आश्वासन दिया और भूल गई। अब 18 साल बाद इस आश्वासन का निराकरण करने की सुध आई है और भोपाल से एक पत्र कलेक्टर अभिजीत अग्रवाल को भेजकर 18 साल पुराने मामले का रिकार्ड मांगा है।
1998 में निर्दलीय विधायक बने बृजराज सिंह चौहान ने अप्रैल 1999 के विधानसभा सत्र में श्योपुर के आदिम जाति विभाग के छात्रावासों के अधीक्षकों की नियुक्ति में घूसखोरी और नियम विस्र्द्ध अपात्रों को पद देने की शिकायत की थी। श्री चौहान ने कई सबूत भी विधानसभा में पेश किए थे।
इसी के आधार पर विधानसभा में सरकार ने आश्वासन दिया था कि, मामले की जांच कराई जाएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी। उस समय कोई जांच हुई न किसी पर कार्रवाई। इस आश्वासन को पूरा करने की सुध सरकार को ठीक 18 साल बाद आई है। जब 21 फरवरी को आदिवासी विकास विभाग की कमिश्नर दीपाली रस्तोगी ने श्योपुर कलेक्टर अभिजीत अग्रवाल को अशासकीय पत्र लिखकर नाराजगी जताई।
कमिश्नर दीपाली रस्तोगी ने अपने पत्र में कहा है कि विस आश्वासन क्रमांक 987 के संबंध में छात्रावास अधीक्षकों की नियुक्ति की जानकारी मांगीी गई थी, जो अब तक नहीं मिली। इस कारण इस विस आश्वान के निराकरण में बेवजह ही विलंब हो रहा है।
कमिश्नर दीपाली रस्तोगी ने कलेक्टर को निर्देश देते हुए लिखा है कि, इसकी जानकारी तत्काल भेजी जाए, जिससे पेंडिंग पड़े इस मामले का निपटारा हो। कलेक्टर श्री अग्रवाल ने इस मामले की पूरी रिपोर्ट तैयार करने के निर्देश आदिम जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त संदीप जैन को दी है। सहायक आयुक्त जैन को पुराने रिकार्ड खंगालकर जानकारी जुटाने में पसीने छूट रहे हैं।
1999 के इस मामले की पूरी रिपोर्ट बन भी जाए और विस में पेश भी हो जाए तो दोषियों पर कार्रवाई होना मुश्किल है, क्योंकि 18 साल में न सिर्फ सरकार बल्कि मामला उठाने वाले विधायक और गड़बड़ी करने वाले अफसर तक बदल गए हैं।
जिन अफसरों पर आरोप हैं वह तो रिटायर हो गए और श्योपुर को छोड़कर दूसरे शहरों में जाकर बस चुके हैं। 1999 में जब यह मामला विस में उठाया था तब बृजराज सिंह चौहान निर्दलीय विधायक थे और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। इसके बाद बृजराज सिंह 2009 से 2014 तक कांग्रेस से विधायक रह चुके हैं।
18 साल पुराने हो चुके इस मामले की जानकारी जुटाने में शासन को खासी मशक्कत करनी पड़ रही है, क्योंकि जिला प्रशासन इतने पुराने रिकार्ड को ढूंढ भी नहीं पा रहा। दूसरी तरफ भोपाल से अब तक कुल चार पत्र इस संबंध में जानकारी देने के लिए आ चुके हैं।
सबसे पहला पत्र 06 नवंबर 2016 को भेजा गया, लेकिन जानकारी श्योपुर से भोपाल नहीं गई। इसके बाद स्मरण पत्र नाम से 04 अगस्त 2016 को दूसरा और तीसरा पत्र 09 सितंबर 2016 को भेजा गया। इन तीन पत्रों के बाद भी श्योपुर से इस मामले की जानकारी नहीं जा पाई इसलिए कलेक्टर अग्रवाल ने इस मामले को टीएल प्रकरणों में भी शामिल कर लिया है।
-विस के प्रति इतनी बड़ी लापरवाही शायद ही इतिहास में पहले कभी हुई हो। मैं इस मामले में राज्यपाल और विस अध्यक्ष को पत्र लिखूंगा। 18 साल पहले के मामले की जानकारी अब मांगी जा रही है। अब इसका औचित्य ही क्या है? न तो वह अफसर बचे हैं नहीं वह कर्मचारी जिन्होंने नियम विरुद्ध पदस्थी कराई थी। नौकरशाहों की यह लापरवाही जनप्रतिनिधियों के काम-काम के लिए चिंता का विषय है।

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