केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय को सूचित किया है कि राजनीतिक दलों को लोक प्राधिकारी बताते हुए सूचना–अधिकार अधिनियम के दायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने एक शपथ पत्र में कहा है कि राजनीतिक दलों को इस कानून के तहत लाए जाने से सुचारु कामकाज में बाधा आयेगी। साथ ही इससे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को जानकारी मांगने के लिए द्वेषपूर्ण तरीके से याचिकाएं दाखिल करने में मदद
सरकार ने कहा है कि जब सूचना अधिकार कानून पारित किया गया था, उस समय यह कल्पना नहीं की गई थी कि राजनीतिक दलों को इस कानून के तहत लाया जाएगा। हलफनामे में कहा गया है कि जन प्रतिनिधित्व कानून-1951 और आयकर कानून में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनसे राजनीतिक दलों के वित्तीय पहलुओं के बारे में जरूरी पारदर्शिता लायी गई है। सरकार ने यह हलफनामा उस याचिका पर जारी किए गए नोटिस के जवाब में दाखिल किया है, जिसमें सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाने के लिए लोक प्राधिकारी घोषित करने का अनुरोध किया गया है।