पुण्य-सलिला क्षिप्रा के तट पर शाम को होने वाली आरती में लघु भारत से एकाकार होने का अवसर सहज ही प्राप्त होता है। मन में अपार श्रद्धा एवं भक्ति भावना से ओत-प्रोत श्रद्धालु अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को समेटे हुए जहाँ मोक्ष की कामना के साथ डुबकी लगाते हैं,
वहीं जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र का भेदभाव किए बिना महाकाल की भक्ति के प्रतीक स्वरूप ललाट में टीका लगाते हैं, फिर आरती के लिए अपनी जगह सुरक्षित कर खड़े हो जाते हैं। घाटों में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला सायं 4 बजे से शुरू हो जाता है। आरती शाम 6%15 बजे से शुरू होती है, जो लगभग एक घंटे तक चलती है।
आरती के दौरान अन्य गतिविधियाँ लगभग रुक सी जाती हैं। श्रद्धालु माँ क्षिप्रा से एकाकार होने का प्रयास करते हैं। इस दौरान साधु-संतों, समाज-सेवियों, श्रद्धालु तथा सुविख्यात हस्तियों द्वारा सामाजिक समरसता, वृक्षारोपण, स्वच्छता, नदियों एवं जल-स्त्रोतों की साफ-सफाई आदि के संदेश दिए जाते हैं।
बैंगलुरु से आये अतुल्य दुबे ने कहा कि इतने व्यापक स्तर पर प्रकृति की पूजा देखने का यह मेरे जीवन का
पहला अवसर है। आरती में श्रद्धालुओं का भक्ति-भाव भारतीय दर्शन को समृद्ध करता है। आरती के दौरान घाटों में खड़े अनुशासनबद्ध लोग, जगमगाता दूधिया प्रकाश एवं घाटों की साफ-सफाई देखते ही बनती है।