क्या है सीरिया संघर्ष की कहानी और क्यों भीड़ रहे अमेरिका रूस

सीरिया में केमिकल हमले से आम नागरिकों की मौत से नाराज अमेरिका ने सीरिया के हवाई ठिकानों पर हमला बोल दिया है। राष्ट्रपित बनने के 77 दिनों के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया में प्रत्यक्ष कार्रवाई के आदेश दिए। इसके बाद अमेरिका ने 50 से ज्यादा टॉमहॉक मिसाइलें सीरिया के हवाई ठिकानों पर दागी हैं।
बता दें कि सीरियाई प्रांत इदलिब में हुए केमिकल हमले में 100 से ज्यादा लोगों की मौत के बाद ट्रंप ने भी इसकी आलोचना की थी। सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद ने सीरिया के हवाई अड्डे पर अमेरिकी नौसेना के हवाई हमलों की निंदा की। उन्होंने तर्क दिया कि वाशिंगटन ने झूठी रिपोर्टों पर कार्रवाई की और आक्रामकता का घातक कार्य किया। अमेरिकी कार्रवाई के विरोध में रूस और ईरान सीरिया के साथ खड़े हो गए हैं।
साल 2011 में संघर्ष उस वक्त शुरू हुआ सरकार में व्यापक सुधारों की मांग को लेकर जब बड़े पैमाने पर राजधानी और अन्य बड़े शहरों में विरोध शुरू हुआ। एक महीने बाद इन प्रदर्शनों में असद को उखाड़ फेंकने की बात की जाने लगी, जिन्होंने देश में स्थिरता बनाए रखने के लिए सुरक्षा बलों को तैनात किया। हिंसक झड़प शुरू हो गई और विरोधियों ने सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया।
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विरोधियों के इस आंदोलन को पश्चिमी देशों और खाड़ी के अरब राष्ट्रों का समर्थित हासिल था। इन देशों ने असद पर उनके लोगों पर हिंसा से दमन किया था। अगले कुछ वर्षों के दौरान सशस्त्र विद्रोहियों ने सीरिया के बड़े हिस्सों और कुछ बड़े शहरी केंद्रों जैसे सीरिया के वाणिज्यिक केंद्र अलेप्पो में कब्जा कर लिया। जैसे-जैसे उग्रवाद बढ़ता गया, वैसे ही विद्रोहियों पर अल-कायदा जैसे जिहादी संगठनों का प्रभाव भी बढ़ता गया।
साल 2013 में ईराक में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने घोषणा की कि वह सीरिया में अल-कायदा के फ्रैंचाइजी नुसरा फ्रंट के साथ अपने संगठन को एकजुट करेगा। आईएस का नेतृत्व प्रभावशाली सुन्नी मुस्लिम अबु बकर अल-बगदादी कर रहा था, जो असद को उखाड़ने के लिए लड़ने वाले सबसे शक्तिशाली समूहों में से एक बन गया था। नुसर के प्रमुख अबु मोहम्मद अल-जुलानी ने इस विलय से इंकार कर दिया। मगर, बगदादी के समूह ने सीरिया पर किसी भी तरह से इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) को स्थापित कर दिया।
आईएस के घुसने के बाद सीरिया के संघर्ष में एक नया अध्याय जुड़ गया। सशस्त्र विद्रोहियों में जिहादी प्रभाव बढ़ गया। इस बीच पेंटागन ने विद्रोही समूहों को दी जाने वाली अपनी मदद के बारे में फिर से विचार करना शुरू कर दिया। दरअसल, ये विद्रोही अमेरिकी प्रशिक्षण और हथियारों को लेकर अल कायदा और आईएस के साथ जुड़ गए थे। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा का ध्यान राष्ट्रपति असद को हटाने से बदलकर आईएस के विस्तार को रोकने पर हो गया।
साल 2014 में अमेरिका ने सीरिया में आईएस के ठिकानों पर हवाई हमले शुरू किए। अगले साल रूस भी इस संघर्ष में कूद गया। दरअसल, 1970 के दशक से रूस और सीरिया के संबंध थे। असद के प्रत्यक्ष अनुरोध पर मॉस्को ने पूरे युद्ध में राजनीतिक रूप से असद का समर्थन किया क्योंकि उनके असद की सेना और उनके सहयोगी जिहादी आतंकियों से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे थे।
रूस के हस्तक्षेप ने सीरियाई सेना को मजबूत कर दिया और आईएस व अन्य विपक्षी समूहों के कब्जे से होम्स और अलेप्पो जैसे प्रमुख सामरिक शहरों को छुड़ा लिया गया। ओबामा ने असद को युद्ध अपराधों का आरोपी करार देते हुए उसका साथ देने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आलोचाना की। इसके जवाब में रूस ने कहा कि सीरिया के सेना के मिशन को कम करके और विद्रोही समूहों का समर्थन करके अमेरिका आतंकवाद का समर्थन कर रहा है।
कट्टरपंथी इस्लामवादी प्रभाव बढ़ता देखकर अमेरिका ने विद्रोहियों का फिर से समर्थन करना शुरू कर दिया। इस बार अमेरिका ने सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्स (सीडीएफ) को समर्थन दिया, जो कुर्दों के प्रभाव वाला संगठन है। इसमें अरब और सीरिया के जातीय अल्पसंख्यक शामिल हैं।
एसडीएफ न केवल आईएस के साथ संघर्ष करना शुरू कर दिया, बल्कि विद्रोहियों से भी वह लोहा ले रहा था। इस बीच एक और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तुर्की सामने आ गया, जो विद्रोहियों को समर्थन देने लगा। दरअसल, एसडीएफ को तुर्की में आतंकवादी समूह माना जाता है, जिसके संबंध आतंकवादी कुर्दिश नेशनलिस्ट ग्रुप से हैं। एसडीएफ की मदद करने के लिए तुर्की, अमेरिका और रूस दोनों देशों की आलोचना कर रहा है।

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