राजनीति में सोशल मीडिया की बढ़ती उपयोगिता को भुना लाखों कमा रहे

कहते हैं कि दोस्ती बिकाऊ नहीं होती लेकिन सोशल मीडिया इसका अपवाद है। यहां आप दोस्त या फालोवर्स खरीद सकते हैं, पैसे खर्च करके उनके लाइक और कमेंट भी हासिल कर सकते हैं। इसके लिए पेशेवर मौजूद हैं। राजनीति में सोशल मीडिया की बढ़ती उपयोगिता को ये दक्ष लोग भुना रहे हैं और लाखों कमा रहे हैं।
2014 का आम चुनाव हो या फिर दिल्ली का विधानसभा चुनाव। सोशल मीडिया की ताकत ने देश की राजनीति को हिला दिया। इसलिए अब लगभग सभी राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय हैं। भाजपा जैसे दलों ने तो अपने प्रत्याशियों के चयन में सोशल मीडिया पर सक्रियता को मानक भी बना लिया है।
शायद यही वजह है कि अब इस क्षेत्र में प्रोफेशनल्स की डिमांड बढ़ रही है। इलाहाबाद शहर में ही ऐसे कई नेता हैं, जिन्होंने अपने फेसबुक पेज ऐसे ही पेशेवरों से तैयार करवाए हैं। उस पर फालोवर्स और लाइक आदि का इंतजाम भी वह करवा रहे हैं, ट्विटर पर तो सक्रियता है ही। सिविल लाइंस में यह काम करने वाले अनुराग मौर्या बताते हैं कि वह पिछले एक साल से यह काम कर रहे हैं। शहर में करीब 10-12 युवा इस काम में लगे हैं।
करीब दर्जन भर नेताओं का फेसबुक पेज तैयार करने वाले अनुराग बताते हैं कि पेज तो दो से चार हजार रुपये में तैयार हो जाता है लेकिन फालोवर्स के लिए ज्यादा पैसा खर्च होता है। एक लाइक के लिए चार रुपये चार्ज किया जाता है। लाइक्स बढ़ाने के लिए फेसबुक पेज का विज्ञापन भी दिया जाता है।
इलाहाबाद में कई ऐसे नेता हैं जो खुद सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं रह सकते। इसमें से कुछेक के पास समय की कमी है तो कुछ तकनीकी तौर पर कमजोर हैं। इसलिए ये लोग एक सोशल मीडिया मैनेजर भी रख रहे हैं, जो फेसबुक, ट्विटर, वाट्सएप आदि पर इनकी तरफ से पोस्ट डालता है। कमेंट करता है और कमेंट के जवाब आदि भी देता रहता है। इन मैनेजरों को भी 20 से 30 हजार रुपये तक वेतन मिल रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *