मुम्बई के किंग्स एडवर्ड मैमोरियल अस्पताल में पिछले 42 वर्ष से कोमा में रही नर्स अरूणा शानबाग की आज सवेरे साढ़े आठ बजे मृत्यु हो गयी। वर्ष 1973 को के ई एम अस्पताल के एक सफाई कर्मचारी ने वहां नर्स का काम कर रही अरूणा शानबाग के साथ दुष्कर्म किया और उसके बाद ही वे कोमा में चली गईं। तब से ही अस्पताल के कर्मचारी उनकी देखभाल कर रहे थे। अरूणा को चार दिन पहले निमोनिया होने पर वेंटीलेटर पर रख गया था। के ई एम अस्पताल के डीन डॉक्टर अविनाश सुपे ने बताया कि अरूणा को सांस में तकलीफ होने पर आई सी यू में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के प्रबंधकों ने अरूणा के संबंधियों से आग्रह किया है कि वह अस्पताल से सम्पर्क करें।
वर्ष 2011 में उच्चतम न्यायालय ने अरूणा शानबाग की ओर से दायर इच्छा मृत्यु याचिका खारिज कर दी थी। पूर्व पत्रकार और लेखक पिंकी विरानी की इस याचिका का के ई एम अस्पताल के प्रबंधकों और नर्सों ने विरोध किया था। अरूणा के जीवन पर विरानी ने 1988 में एक पुस्तक लिखी थी, ‘अरूणाज स्टोरी’, इसके अलावा दत्ता कुमार देसाई ने मराठी नाटक ‘कथा अरूणाचि’, लिखा जिसका मंचन निर्देशक विनय आप्टे ने 2002 में किया। अरूणा शानबाग की मृत्यु से के.ई.एम के नर्सिस और अन्य कर्मचारियों के बीच दुख का वातावरण फैल गया है। इस मृत्यु ने उनका अरूणा से पिछले 42 सालों का संबंध खत्म कर दिया है। के.ई.एम के कर्मचारी और नर्सिस ने अरूणा का साथ तब दिया जब उनका परिवार भी साथ नहीं था। अरूणा पर नवंबर 1973 में हुए बलात्कार की कोशिश के बाद वह कोमा में चली गई थीं जिसके चलते मुंबई भर की नर्सिस ने हड़ताल कर यह मांग की थी कि अरूणा को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दी जायें और नर्सिस की सुरक्षा बढ़ाई जाये। यही नर्सिस बीएमसी के खिलाफ भी उठ खड़ी हुई थी जब बृहन मुंबई में सिविल कोरपोरेशन ने अरूणा को केईएम को बाहर निकालने की कोशिश की थी। सर्वोच्च न्यायालय के यूथेनेसिया के खिलाफ दिए गए निर्णय के बाद अरूणा का ध्यान रखने वाले नर्सिस ने हॉस्पीटल में मिठाई बांटी थी और इसे अरूणा का पुनर्जन्म बताया था